Anis shah anis

तुम्हारी आँखें कमाल आँखें, तुम्हारा हुस्न-ओ-जमाल आँखें
खिले कँवल ख़्वाबों के हैं कितने, तुम्हारी आँखें हैं ताल आँखें

बदन है शाही महल ये उनका, है इसमें दीवान-ए-ख़ास ये दिल
ये अबरू महराब जिसके नीचे, खड़ीं हैं दो द्वारपाल आँखें

गुलाब आरिज़, हैं बर्ग-ए-गुल लब कमान अबरू, घटाएँ गेसू
अब इस्तिआ'रा इन्हें मैं क्या दूँ , तुम्हारी हैं बे-मिसाल आँखें

परिंदा दिल का कहीं न हो जाए, क़ैद अब  हुस्न के क़फ़स में
अदाओं के दाने डाल कर, ये बिछाये बैठीं हैं जाल आँखें

हुई नहीं भी है  लब-कुशाई, हुई मुकम्मल है गुफ़्तगू पर
जवाब आँखों ने दे दिये हैं, जो कर रहीं थीं सवाल आँखें

अगर उठीं तो ये साथ उठतीं, झुकी अगर तो ये साथ झुकतीं
ये साथ हँसतीं ये साथ रोतीं, हैं कितनी ही हम-ख़याल आँखें

ये आसमाँ, रेग़जार जंगल, पहाड, झरना, नदी, समंदर
'अनीस' इतने हैं जज़्ब मंज़र, हमारी इतनी विशाल आँखें
Anis shah anis