न काम पास का आया न दूर का चश्मा
चढ़ा है आँखों पे जब से ग़ुरूर का चश्मा
चमक-दमक के अलावा न कुछ दिखाई दे
है किस मिज़ाज का मेरे हुज़ूर का चश्मा
ख़ुमार जिसका कभी होश में न आने दे
उतार फेंकिए ऐसे सुरूर का चश्मा
दिल-ओ-दिमाग़ से लेते नहीं हो काम कोई
लगा के बैठे हो तुम किस फ़ितूर का चश्मा
नज़र के ऐब न "संगीत" दूर होंगे कभी
करोगे साफ़ न जब तक शु'ऊर का चश्मा
Sangeet pandey