सब्र की तह में भी छुपाई चोट
फिर भी अश्कों में झिलमिलाई चोट
दर्द आँखों में जागता ही रहा
रात-भर मैंने थपथपाई चोट
इश्तिहारात के चलन तौबा
सबने बढ़-चढ़के फिर दिखाई चोट
मैं हूँ इंसानियत का पैरोकार
मेरे सीने में है पराई चोट
ज़िंदगी को गुज़ारने के लिए
दिल का सौदा किया कमाई चोट
saleem sarmad