ग़म लिए मुस्कुराके बैठ गएअपने आँसू छुपाके बैठ गएभूख बढ़ने लगी मोहब्बत की इक बदन और खाके बैठ गए मंज़िलें दौड़ने लगी आगे रास्ते लड़खड़ाके बैठ गएNivedan Mishra