Nivedan Mishra

ग़म लिए मुस्कुराके बैठ गए
अपने आँसू छुपाके बैठ गए

भूख बढ़ने लगी मोहब्बत की
इक बदन और खाके बैठ गए

मंज़िलें दौड़ने लगी आगे
रास्ते लड़खड़ाके बैठ गए
Nivedan Mishra