Mahesh Kumar Kuldeep

मसर्रत से भरे होते हैं जी हम गाँव के लड़के
ग़मों के सामने होते नहीं ख़म गाँव के लड़के

गिरे तो उठ गए ख़ुद धूल झाड़ी चल पड़े फिर से
किया करते नहीं गिरने का मातम गाँव के लड़के

ज़रूरत ही नहीं पड़ती किसी आँचल के महरम की
ख़ुद अपने ज़ख़्म का होते हैं मरहम गाँव के लड़के

अदब सादा-मिज़ाजी सादगी ईमान-दारी फ़ैज़
उठाए फिर रहे हैं कितने परचम गाँव के लड़के

अँधेरों ने सफ़र मुश्किल बना रक्खा भी हो तो क्या
चराग़ों की तरह जलते हैं पैहम गाँव के लड़के

ग़रीबी में पले हैं भूख से रिश्ता पुराना है
रखा करते हैं अपनी जेब में ग़म गाँव के लड़के
Mahesh Kumar Kuldeep

Mahesh Kumar Kuldeep | We The Sukhanwar