Sandeep Shrivastava

उठाए फिरते हो लाश-ए-यक़ीन शाने पर
भरोसा कर लिया था तुमने क्या ज़माने पर

बताओ जान! मुझे सच बताओ, ठीक तो हो?
नमी-सी रहती है दिन-रात मेरे शाने पर

परिंदे क़ैद में बस रो रहे थे अपना दुख
तमाम लोग थे ख़ुश उनके चहचहाने पर

फ़क़त सुख़न से नहीं हो सका गुज़ारा सो
दोबारा लौटके आया हूँ कारख़ाने पर

कभी हुआ ही नहीं हमसे पटरियों पर शे'र
निकाल लेते हैं जीने के हम बहाने पर

तुम्हें जो चाहिए वो पास था मेरे लेकिन
तुम आके बैठ गए थे मेरे सिरहाने पर

हयात जंग है, इस जंग में हमारा ही
कोई भी तीर नहीं लगता है निशाने पर
Sandeep Shrivastava

Sandeep Shrivastava | We The Sukhanwar