Sandeep Shrivastava

पुराने ज़ख़्म से कर छेड़छाड़ बैठे हैं
पुराने हिज्र की परतें उखाड़ बैठे हैं

हमारी प्यास का दर्जा ज़रा करो महसूस
हम ऐसी मछली हैं चढ़ के पहाड़ बैठे हैं

हुनर तराश ले अपना ए मेरे कूज़ा-गर
बिगाड़ना है हमें? आ, बिगाड़, बैठे हैं

तुम्हारे साथ ही रौनक़ चली गई घर से
हमारे साथ ये कुर्सी किवाड़ बैठे हैं

अब अपने ख़्वाब के टुकड़े निकालें आँखो से
हम अपने ख़्वाब सभी तोड़-ताड़ बैठे हैं

मलेंगे हाथ भी सर भी धुनेगें हम अपना
अब और क्या करें दुनिया उजाड़ बैठे हैं

क़ज़ा तलक भी रसाई नहीं हमारी सो
रह-ए-हयात में बन के कबाड़ बैठे हैं
Sandeep Shrivastava

Sandeep Shrivastava | We The Sukhanwar