पुराने ज़ख़्म से कर छेड़छाड़ बैठे हैं
पुराने हिज्र की परतें उखाड़ बैठे हैं
हमारी प्यास का दर्जा ज़रा करो महसूस
हम ऐसी मछली हैं चढ़ के पहाड़ बैठे हैं
हुनर तराश ले अपना ए मेरे कूज़ा-गर
बिगाड़ना है हमें? आ, बिगाड़, बैठे हैं
तुम्हारे साथ ही रौनक़ चली गई घर से
हमारे साथ ये कुर्सी किवाड़ बैठे हैं
अब अपने ख़्वाब के टुकड़े निकालें आँखो से
हम अपने ख़्वाब सभी तोड़-ताड़ बैठे हैं
मलेंगे हाथ भी सर भी धुनेगें हम अपना
अब और क्या करें दुनिया उजाड़ बैठे हैं
क़ज़ा तलक भी रसाई नहीं हमारी सो
रह-ए-हयात में बन के कबाड़ बैठे हैं
Sandeep Shrivastava