Ejaz Rahbar

रफ़्ता–रफ़्ता बढ़ाओ क़दम यूं न दौड़ो फिसल जाओगे
ख़ुद को समझोगे सूरज अगर, शाम होते ही ढल जाओगे

ख़्वाबगाहों से निकलो ज़रा और करो सामना धूप का
इक ज़रा सी तपिश से ही तुम मोम जैसे पिघल जाओगे

पालते ही रहेंगे तुम्हें जबकि फ़ितरत से वाक़िफ़ हैं हम,
जब भी चाहोगे डसना हमें, आस्तीं से निकल जाओगे

अर्तुरूल और उस्मान की पढ़ के तारीख़ देखो ज़रा
या तो बातिल से लड़ जाओगे या तो डर से दहल जाओगे

जंग लाज़िम हो रहबर अगर तो लड़ो तुम बड़ी शान से
जान लोगे शहादत है क्या, तो ख़ुशी से मचल जाओगे
Ejaz Rahbar

Ejaz Rahbar | We The Sukhanwar