बरबस आंखे भर आती हैं।

तुम बिन हर दिन पीड़ा देता
और रातें भी तड़पाती हैं।
जब आती है याद तुम्हारी
आँखें बरबस भर आती हैं।

तुमसे बिछड़े सदियाँ बीती पर बिछड़न के घाव हरे हैं।
सुख निर्वासित हैं आँगन से दुःख ड्योढ़ी तक पाँव धरे हैं।
एक तुम्हारे ख़ालीपन का चित्र अकेले कब तक रंगें?
हाथ उदासी की डोरी अब खुशियों की सब कटी पतंगें।

यदि कुछ पल मै हँस लूं खुलकर
साँसें बोझिल हो जाती हैं।
जब आती है याद तुम्हारी
आँखें बरबस भर आती हैं।

जब से तुम हो रूठे मुझसे जग ये लगता रूठा-रूठा।
मन वैरागी हो बैठा है हाथ तुम्हारा जब से छूटा।
दौलत, शोहरत, महल, अटारी लगते पीड़ा की परछाई।
और महफ़िल के उत्सव सारे भेंट में देते हैं तन्हाई।

अब तो सारी आशाएँ भी
गीत निराशा के गाती हैं।
जब आती है याद तुम्हारी
आँखें बरबस भर आती हैं।

सपनों के पथरीले पथ पर जब जब साथ तुम्हारे घूमे।
होंठों की सूखी परतों को तब तब आँसू आकर चूमे।
अंतर्मन की उस वेदी पर मूर्ति तुम्हारी स्थापित है
जहाँ रुद्ध है अन्य आगमन अन्य कल्पना तक वर्जित है।

पावनता की निश्छल कलियाँ
अर्पित होकर इठलाती हैं।
जब आती है याद तुम्हारी
आँखें बरबस भर आती हैं।
Sameer Tiwari