तुम विदा जब हो रहे थे

आँसुओं से हम प्रणय का
घाव उस दिन धो रहे थे
तुम विदा जब हो रहे थे!

ब्याह की उस रात जब तुम बन-सँवरकर ठन रहे थे
एक अनजानी कथा का तुम कथानक बन रहे थे
अंततः तुमने हमारी ख़त्म कर दी सब कहानी
उस अपरिचित हाथ से लेकर शुभे! सिंदूरदानी

देखकर वह दृश्य उस पल
हम तड़पकर रो रहे थे
तुम विदा जब हो रहे थे!

भोर होते ही तुम्हारी इक सहेली पास आई
भेट में मुँदरी, कलावा, पत्र और तस्वीर लाई
पत्र में तुमने लिखा था अब मिलन संभव नही है
भाग्य में अपने प्रिये अब प्रीत का उद्भव नही है

और उस दिन भाग्य की हम
हर विवशता ढो रहे थे
तुम विदा जब हो रहे थे!

पालकी में जब तुम्हें परिजन सभी बैठा रहे थे
दोष-गुण संबंध का सब वो तुम्हें समझा रहे थे
आँख जब तुमने सभी के सामने मुझसे मिलाई
अश्रु से हमने करी तब एक-दूजे की विदाई

याद में उस दिन तुम्हारी
हम स्वयं को खो रहे थे
तुम विदा जब हो रहे थे!
Sameer Tiwari

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