नज़र पड़ते ही पलकों का वो पर्दा ओढ़ लेती है
किताबों को सही करके दुपट्टा ओढ़ लेती है
अगर मैं रात को घर की कभी बत्ती जलाता हूँ
वो बाज़ू सर के नीचे रखके तकिया ओढ़ लेती है
अमीरी सीख ले तू भी अगर कुछ सीखना चाहे
ग़रीबी ख़ुद-ब-ख़ुद पुरखों का क़र्ज़ा ओढ़ लेती है
उसे मालूम है सरहद ने मुझको बाँध रक्खा है
बड़ी चादर दुहर करके वो तन्हा ओढ़ लेती है
नहीं देखी ग़रीबी तुम भला क्या ख़ाक समझोगे
जवानी फावड़ा बन करके बस्ता ओढ़ लेती हैं
Sanjay Chaturvedi