घर के चौकीदार हुए दादा-दादी
सबके पहरेदार हुए दादा-दादी
बीमा की फसलें पककर तैयार हुईं
मरने को तैयार हुए दादा-दादी
कौन ख़रीदे नहीं रहे पढ़ने वाले
उर्दू के अख़बार हुए दादा-दादी
घर में सारे सुख लाये बेटे पोते
दुख के ज़िम्मेदार हुए दादा-दादी
उनके ही गहने बेचे उनकी लाठी
कभी अगर बीमार हुए दादा-दादी
कौन उन्हें पहचाने समझे कौन उन्हें
ख़ुद अपना परिवार हुए दादा-दादी
घर में उनका नहीं रहा हिस्सा कोई
कपड़ों वाला तार हुए दादा-दादी
Sanjay Chaturvedi