प्रकृति पढ़ाये हमें ककहरा

प्रकृति पढ़ाये हमें ककहरा बेटा अ, आ, इ, ई, ऊ
मौसम के द्वारा दिखलाये सर्दी, आतप, वर्षा, लू

हवा चले जब सर-सर सर-सर हम कितना सुख पाते हैं
बारिश हो घनघोर अगर तरुछाया में रुक जाते हैं
सावन में पेड़ों की शाखों पर रस्सी का फंदा बुन
झूले लटकाकर सखियों सँग गीत मल्हारें गाते हैं

नये-नये रँग-रूप सजाकर प्रकृति नटी करती जादू
प्रकृति पढ़ाये हमें ककहरा बेटा अ, आ, इ, ई, ऊ

सोचो तो हर पत्ता-पत्ता जतलाता है अपनापन
उन्हें देखकर खिल जाता है धरती के मन का आँगन
लदे-फदे जब फूल-फलों से इतरायें अनगिन तरुवर
मधुप तितलियों के वंदन से गुंजित हो जाता है वन

उड़नतश्तरी जैसे बादल हो जाते तब बेक़ाबू
प्रकृति पढ़ाये हमें ककहरा बेटा अ, आ, इ, ई, ऊ

पाल-पोसकर पानी देकर जंगल रक्खें हरा-भरा
खनन छोड़कर पुष्ट करें हम उर्वरता की कोख ज़रा
नहीं सूखने दें मिट्टी के अंतर्मन की गहराई
रहें सृजन के स्रोत सुरक्षित और सुरक्षित वसुन्धरा

रहें सहायक हम धरती के नहीं बनें पागल बिच्छू
प्रकृति पढ़ाये हमें ककहरा बेटा अ, आ, इ, ई, ऊ
Nirupama Chaturvedi