Shadab bastavi

इश्क़ के जंजाल से बाहर भी आना है मुझे
और सबको इश्क़ का किस्सा सुनाना है मुझे

हिजरत-ए-शब का वो मंजर खुदकुशी की ख्वाहिशात
और उसपे उसका कहना जल्दी जाना है मुझे

फूल थे जब राह में तो आबले कैसे पड़े
इश्क़ की ये राह थी सबको बताना है मुझे

हुक्मरानी आपकी है आप ही बतलाइए
अश्क को हंसते हुए कब तक छुपाना है मुझे

ता क़यामत तक तुम्हारा ज़िक्र होगा जां मेरी
एक दो थोड़ी हजारों दिल जलाना है मुझे

पहला दुःख तो ये कि तेरे सामने रोना नहीं
और उस पर दूसरा की मुस्कराना है मुझे

चाँद तारे फूल मय शबनम जरा सा ज़हर भी
सब मिला करके तेरा चेहरा बनाना है मुझे
Shadab bastavi