किसी की याद का मंज़र लपेट लेते हैं
हवा हो सर्द तो मफ़लर लपेट लेते हैं
सफ़र तमाम हुआ रेल रुकने वाली है
उतरने वाले भी बिस्तर लपेट लेते हैं
बस एक रात की मेहमान है ये दीवाली
सवेरा होते ही झालर लपेट लेते हैं
तमाम बातें सियासत छुपा के रखती है
तमाम बातें ये अफ़सर लपेट लेते हैं
हमारा अज़्म भी आया है चल के पोरस से
जुनूँ में हम तो सिकंदर लपेट लेते हैं
बहुत से लोग बहकते हैं एक चुल्लू में
बहुत से लोग समंदर लपेट लेते हैं
Rambabu Rastogi