Rambabu Rastogi

जहाँ पर थी घनी बस्ती वहाँ जंगल निकल आये
तअज्जुब कुछ नहीं गर रेत में दलदल निकल आये

बरसने के लिये हालाँकि वो तैयार थे लेकिन
ज़मीं की हरक़तों से ऊबकर बादल निकल आये

सियासत हो गयी हैं बद-नज़र यूँ मेरी बस्ती की
छुरे सोने का बर्तन तो वहाँ पीतल निकल आये

ज़माना तंगदिल, मौसम ख़फ़ा, नाराज़ हैं हमदम
हमारी मुश्किलों का कैसे कोई हल निकल आये

हमेशा आँसुओं का साथ देना भी नहीं अच्छा
वो रोना क्या कि जिसमें आँख से काजल निकल आये

इकठ्ठा हो गये दिल्ली में सारे नामवर डाकू
जहाँ यमुना है शायद कल वहाँ चम्बल निकल आये
Rambabu Rastogi

Rambabu Rastogi | We The Sukhanwar