मोहब्बत की लिखावट को जुदाई चाट जाती है
बहुत दूरी ख़तों की रौशनाई चाट जाती है
किसी को दोस्त कह देना बहुत आसान है लेकिन
ये लग्ज़िश ज़िंदगी भर की कमाई चाट जाती है
सियासत बात करती है तवायफ़ की ज़ुबाँ में अब
जिसे छूती है उसकी पारसाई चाट जाती है
वहाँ चक्कर लगाती है वो अगले छह महीनों तक
जहाँ बिल्ली कभी घुसकर मलाई चाट जाती है
ज़मीं से आसमाँ जो नापते थे चंद क़दमों में
उन्हीं मज़बूत पाँवों को बिंवाई चाट जाती है
बहुत नुक्सान देता है हमेशा तंज़िया लहज़ा
ये वो शय है जो रिश्तों की मिठाई चाट जाती है
Rambabu Rastogi