Rambabu Rastogi

वो मुजरिम है मगर अब मुंसिफ़ों के बीच रहती है
यहाँ तो पाँव की जूती सरों के बीच रहती है

कहीं माला चढ़ाती हो ओढ़ाती है कहीं चादर
कि दिल्ली आजकल बाज़ीगरों के बीच रहती है

हमें लूटा गया है मंदिर-ओ-मस्ज़िद की मंडी में
हमारी ज़िन्दगी सौदागरों के बीच रहती है

हकीमों की लड़ाई में मुसीबत है मरीज़ों की
ये नन्हीं जान किन चारागरों के बीच रहती है

पुजारी हो के जी सकते हो या फिर मौलवी बनकर
सियासत आजकल इन डाकुओं के बीच रहती है

जिन्हें तकलीफ़ है पूजा-भजन, सजदा, इबादत से
हमारी आस्था उन सिरफ़िरों के बीच रहती है
Rambabu Rastogi