समंदर के जिगर में आजकल सहरा निकलता है
जिसे भी मोम कहता हूँ वही शीशा निकलता है
रवादारी, मोहब्बत, दोस्ती, एहसान, क़ुर्बानी
हमारे दौर में हर रंग क्यों कच्चा निकलता है
सियासत फूल में, पत्तों में, काँटों में, हवाओं में
जिसे सच्चा समझता हूँ वही झूठा निकलता है
इसी जम्हूरियत के ख़्वाब ने जी भर हमें लूटा
मैं जो सिक्का उठाता हूँ वही खोटा निकलता है
बदलते मौसमों में हाल है ऐसा गुलाबों का
जहाँ से इत्र मिलता था वहाँ सिरका निकलता है
Rambabu Rastogi