दुआओं के ख़ुल्द से निकलकर या नूर-ए-बुत का जमाल छूकर।
हमारे ख़्वाबों को उनकी मंज़िल मिली है तेरे ख़याल छूकर
मायूसियाँ थीं, न ख़ुशबू -ए- गुल, न बाग़बानी की नाज़ुकी थी
उदासियाँ पर पिघल रही अब तुम्हारा भेजा रुमाल छूकर
अगरचे तेरे सवाल का डर ज़रा भी होता हमें तो शायद
हमारी चुप्पी सहेज लेती नज़र को गोया सवाल छूकर
नहीं! फ़राग़त न मिल सकेगी किसी का आब-ए-मलाल होके
सुकून पाएगा शख़्स आख़िर किसी का आब-ए-मलाल छूकर
ख़मोशियों की ज़बांदराज़ी वो कैसे आख़िर समझ सकेंगे
जिन्होंने देखे नहीं हों आँसू जो मिट गए तेरे गाल छूकर
कहाँ ज़रूरी है बात कहना कहाँ ज़रूरी ख़मोश रहना
सलाहियत आ भी जाए गर तो तू लफ़्ज़ अपने उछाल छूकर
क़फ़स में बैठी हुई कोई जाँ रिहा हुई तो लगा कि जैसे
शिकार कोई उड़ा यकायक किसी शिकारी का जाल छूकर
Kanupriya