आप अपनी ही ख़ुद-शनासी में
ख़्वाब अटके रहे उबासी में
इश्क़ ने अपनी ख़ुश-क़यासी में
नींद की जान ली म'आसी में
साथ चल पड़ता है बच्चे की तरह
दिल-ए-नादान रू-शनासी में
पास आते तो हैं सँभलकर लोग
दूर जाते हैं बद हवासी में
इक नदी अहद-ए-वस्ल करती है
चाँद से नक्श-ए-इनइकासी में
ऊबकर ख़ुदकुशी ही करती है
ज़ब्त की ख़ामुशी उदासी में
Kanupriya