Kanupriya

हमने जिस नाम को लुग़त समझा
आपने लफ़्ज़-ए-दस्तख़त समझा

मुझको मत मेरी ही सिफ़त समझा
मैं तेरा मन हूँ इतना मत समझा

अक़्लमंदी-ओ-मस्लेहत समझा
यार! दुनिया की अहमियत समझा

मेरी आदत थे तुमने लत समझा
हाय! समझा मगर ग़लत समझा

लाल ख़ूँ भी है ख़ून-ए-जाम भी जान
अपनी आँखों की अस्लियत समझा

इश्क़ करना मुनाफ़िक़त है दोस्त
गर नहीं तो सलाहियत समझा

लफ़्ज़-ए-'तू' से ही थी मयस्सर जो
ज़ीस्त को हमने कैफ़ियत समझा
Kanupriya