वस्ल की ख़ुशियाँ कभी बनके जुदाई आँसू
आँख से माँगते हैं अपनी रिहाई आँसू
हिज्र-वालों के लिए कर्ज़-अदाई आँसू
ये ख़सारा है मगर इसकी कमाई आँसू
बाँधकर सिसकियों में दिल की शिकायत सारी
मुझको करने ही नहीं देते बुराई आँसू
आपके बाद मुझे मेरी ग़ज़लगोई पर
रात-भर देते रहे आके बधाई आँसू
बन्द आँखों से ही दिख पाएगी जुम्बिश इनकी
आँख वालों को नहीं देते सुनाई आँसू
ज़ब्त ऐसा कि बिछड़कर भी न रो पाया है
जबकि होता है किसी दिल की दुहाई आँसू
हमने सोचा था बरस जाएँ तो रोशन हो मगर
आँख पे पर्त थी और पर्त पे काई आँसू
Kanupriya