Kanupriya

हाय! अंदाज़ गोश-ए-तसव्वुर का इक इस्तिआरा हुआ
अपने रंग-ए-सुख़न सा हुआ वक़्त मेरा गुज़ारा हुआ

खटखटाते हुए दर सदाओं का मुझको ये उम्मीद थी
रो पड़ेगी मेरी ख़ामुशी जब मिलेगा पुकारा हुआ

ज़िन्दगी में जो ख़ुशियाँ हैं वो निस्बतन ख़ुद की सोहबत से हैं
और दुःख सोहबत-ए-ग़ैर की आरज़ू का पसारा हुआ

काम आये तुम्हारे तो रख लेना बस इतनी ताक़ीद है
तुम सँभालोगे न माँगकर दिल ये सबका नकारा हुआ

वो बहुत ख़ूबसूरत है जैसे कि वो कोई आसेब हो
सो तसव्वुर से निकला नहीं जीतकर इश्क़ हारा हुआ

ये जो फ़र्क़-ए-वुजुदात हैं वो ख़ुदा की तवज्जो से हैं
कोई यूँ ही नहीं धूल मिट्टी हुआ या सितारा हुआ
Kanupriya