प्रेम हर्षोल्लास से रीता है मेरा मन अभागे
मैं समर्पित कर रही हूँ तुमको अपनी वेदनाएँ
वेदनाएँ जो परस्पर नैन-जल का आचमन हैं
वेदनाएँ जो प्रणय के होने का अंतिम वचन हैं
वेदनाएँ हैं उपस्थित प्रेम के चरमोत्कर्ष पर
वेदना दम तोड़ देगी प्रेम में उल्लास होकर
प्रेम में फिर भी तुम्हें मैं दे रही हूँ भावनाएँ
मैं समर्पित कर रही हूँ तुमको अपनी वेदनाएँ
प्रेम! अपनी जीवनी में क्यूँ मिलन ही लिक्खे जाएँ
क्यूँ नहीं प्रेमी विलग हो नेत्र को सरिता बनाएँ
प्रेम की धरती पे क्यूँ अंकुर सदा स्मित के फूटें
क्यूँ नहीं इस प्रेमवन को अश्रुओं से प्रेमी सींचें
प्रेम के होने के अर्थों में लिखी हैं यातनाएँ
मैं समर्पित कर रही हूँ तुमको अपनी वेदनाएँ
वेदना यमुना-से आँसू बन भरेगी नैन-गागर
वेदना मंदार हो निश्चित मथेगी क्षीरसागर
वेदना ही मूल जग का वेदना ही शाश्वत है
वेदना पाने के हेतु प्रेम करता यह जगत है
प्रेम में बिल्कुल न हों जब प्रेम-रूपी एषणाएँ
मैं समर्पित कर रही हूँ तुमको अपनी वेदनाएँ
Kanupriya