Kanupriya

बहुत बौनी लगी दुनिया की जमघट आपको छूकर
तो क्यूँ न जानिब-ए-दुनिया चलें माँ-बाप को छूकर

मेरी साँसों से शीशे पर उभरती छाप को छूकर
तेरा चेहरा बनाया उँगलियों ने भाप को छूकर

कलाई पर कलावे और उसकी नाप को छूकर
अयाँ हम पर हुई यूँ जान की हद आपको छूकर

समय रहते सँभल जाने में ही दानिश-वरी होगी
वगरना रूह मरती है बदन से पाप को छूकर

हमारे रब्त-ए-बाहम ने बदल दी इश्क़ की तासीर
कि जैसे ग्लेशियर ने शक्ल बदली ताप को छूकर

इसे तू इश्क़ की मासूमियत कह और कुछ मत बोल
तेरे पीछे हम आयेंगे तेरी पदचाप को छूकर

अकेलापन नहीं ये हिज्र के हम-शक्ल जैसा है
हमें जीना पड़ा ही इश्क़ के अभिशाप को छूकर
Kanupriya

Kanupriya | We The Sukhanwar