मुहब्बत ज़ख्म है मरहम नहीं है
हमें ये तज्रबा कुछ कम नहीं है
नहीं जी पाएँगे इस ग़म में बेशक
मगर मर जाएँ इतना ग़म नहीं है
लबों को चूमकर लौटे थे उसके
अभी तक होश का आलम नहीं है
तुम्हारे बाद ख़ामोशी को चाहा
ये किस्सा हिज्र है मातम नहीं है
हमारे बीच में दर्दों का रिश्ता
किसी भी राब्ते से कम नहीं है
मुहब्बत के सफ़र में ऐ परिंदे
ख़िजाँ से मासिवा मौसम नहीं है
Kanupriya