बुतों को मान लिया देवता हवाओं ने
सो आज बुत-कदों का रुख़ किया हवाओं ने
बदलते मौसमों को देखकर लगा ऐसा
कि जैसे पहना हो रंग इश्क़ का हवाओं ने
हवा ख़िलाफ़ थी फिर भी दुआएँ आती रहीं
दुआ को यानी दिया रास्ता हवाओं ने
फ़िज़ा के रंग को छूकर भी न छूना यकसर
तुझे सिखाया है ये क़ाएदा हवाओं ने
इन्हें चराग़ जलाना था घर जला आईं
ये किस हवा को चुना रहनुमा हवाओं ने
धनक, घटाएँ, शफ़क़, चाँद, चाँदनी गोया
तुम्हारे इतने दिए नक़्श-ए-पा हवाओं ने
तुम्हारे जिस्म का सदका उतारकर लाईं
हमारे जिस्म को ज़िंदा रखा हवाओं ने
Kanupriya