यही है मर्म उल्फ़त का यही है इश्क़ का हासिल
किसी का टूटता है घर किसी का टूटता है दिल
निज़ाम-ए-दहर में गर आपका कोई दख़ल है तो
जहाँ में ख़ामियाँ क्यूँ है ख़ुदा सब क्यूं नहीं कामिल
तुम्हीं तुम हो जहाँ तक जा रही हैं चार-सू नज़रें
हमीं हम हैं जहाँ तक है तुम्हारा दौर-ए-मुस्तक़बिल
मुझे जानो मुझे समझो जो न समझो तो ये सुन लो
मुझे सुनना ही आसाँ है मेरी चुप सहना है मुश्किल
निजात-ए-दर्द की उम्मीद में किस दिल पे दस्तक दें
यहाँ पर दिल तो मुंसिफ़ है मगर नज़रें तो हैं क़ातिल
Kanupriya