कोई अंदाज़ा नहीं है मुझको मेरी पीर का
क्या सुनाऊँ मैं फ़साना आपको तक़दीर का
यह हुआ दिल पर असर उसकी निगाहें तीर का
साँस लेना भी है मुश्क़िल आशिक़-ए-दिलगीर का
किस क़दर रोते हैं देखो यह दर-ओ-दीवार भी
आज हिस्सा हो गए माँ-बाप भी जागीर का
है तसव्वुर में वही मौजूद मेरे आजतक
ख़्वाब जो देखा था मैंने पुर-कशिश तस्वीर का
उस ख़ुदा-ए-पाक ने हमको वही तौफीक़ दी
था गुज़िस्ता वक़्त फ़न जो दाग़, ग़ालिब, मीर का
कुछ कशिश थी हुस्न में भी कुछ निहाँ अरमान भी
उसके दर से राँझा गुज़रा दिल दुखाया हीर का
Aatish Muradabadi