तेरी बातों में खो गए थे हम
ज़िंदगी तेरे हो गए थे हम
टूट कर चाहने की आदत में
टूट कर चूर हो गए थे हम
रात भर ख़्वाब एक से आए
एक करवट पे सो गए थे हम
उसको बरसों के बाद देखा था
जिसकी उम्मीद खो गए थे हम
दिल कहाँ से मिला तुम्हें हम में
पूरे पत्थर के हो गए थे हम
एक उम्मीद चट से टूटी थी
ज़ाहिरन थोड़ा रो गए थे हम
रोम को देखते रहे जलते
तेरी बंसी में खो गए थे हम
रम्ज़ कुछ भी बचा नहीं अपना
सबको मालूम हो गए थे हम
Surendra Bhatia 'Salil'