पूछिए मत किस क़दर जी-जान लेकर चल पड़े
इक बदन में जब से दो इंसान लेकर चल पड़े
हम मुसाफ़िर लोग इक दिन ज़िंदगी की राह में
जिस्म के जैसा कोई सामान लेकर चल पड़े
एक दिन थक हार कर फिर मंज़िलों को ढूंढने
रहगुज़र का पाँव का एहसान लेकर चल पड़े
लोग जो करते थे सुब्ह-ओ-शाम आज़ादी की बात
सब परिंदों की तरफ ज़िंदान लेकर चल पड़े
आपको हैरत है कैसे मौत की जानिब ये लोग
साँस लेने का नया फ़रमान लेकर चल पड़े
हिज्र आँसू ज़ख़्म यादें राएगानी वहशतें
इश्क़ के हिस्से में कुछ नुक़सान लेकर चल पड़े
आपने आँखें डुबो दीं आँख में इक शख़्स के
हम भी दीवारों की जानिब कान लेकर चल पड़े
आप दौलत ले के आए हैं भरे बाज़ार में
और खाली हाथ हम ईमान लेकर चल पड़े
आप जैसे लोग तो क़ाबिल में होते थे शुमार
आप जैसे लोग भी मीज़ान लेकर चल पड़े
Nivedan Mishra