आसक्ति

यदि बनें आसक्त तो हम गर्त का अनुमान कर लें
चेतना की शून्यता का मनु! यही कारण बनेगी।

हाय यह प्रस्तर नहीं;क्यों प्राण पर गौरव रखा है?
दुंदुभी की नाद ध्वनि पर निश्छलों का शव रखा है
क्यों तुम्हारी लालसा है उच्च हर प्राणी प्रकृति पर?
क्या तुम्हारे पाप का प्रतिफल अभीतक नव रखा है?

यदि बनें वीभत्स तो अलगाव का अनुमान कर लें
चित्त की दृढ़ क्रूरता का मनु! यही कारण बनेगी।

मधुप का मधुमास निश्चित, है रुदन कब हास निश्चित
राजसुख होते छलावे, बाद के वनवास निश्चित
मृत्यु से अनभिज्ञ हैं जो, जो बुढ़ापे से अपरिचित
बुद्ध से सुकुमार का भी अंत में संन्यास निश्चित

मोह का अतिरेक हो यदि,त्याग का अनुमान कर लें
इस जगत से बाध्यता का मनु! यही कारण बनेगी

एकपक्षी भाव, निर्णय न्याय में बाधक रहा है
गाँठ अपनी खोलकर जो भी उठा साधक रहा है
द्वंद्व से हारा हुआ मन जब कभी निरुपाय होता
लोक संगति छोड़ निर्जन राह आराधक रहा है

लोक की दूषित प्रकृति हो अवनमन का भान कर लें
संकुचन की अवस्था का मनु! यही कारण बनेगी।
यदि बनें आसक्त तो हम गर्त का अनुमान कर ले
चेतना की शून्यता का मनु! यही कारण बनेगी।
Veeresh Pandey