जब विचारों के शिखर पर प्रेम के हिम कण गिरे तो,
मन लगा फिर गीत गाने,प्यार में रमने लगा तन
हो गया धूमिल ,जगत पर प्रेम का इक आवरण था,
खग-नदी ,आकाश-झरने,मनहरण वातावरण था,
दृष्टियों में थे समोये चाँद- तारे,नीड़-उपवन,
तब कुसुम सी इक छुवन से,बर्फ सा जमने लगा तन
एक हलचल उर जलधि में,थी सुनामी की प्रणेता,
कल्प मेधा का ये नाविक था सहज ही नाव खेता,
ज़िन्दगी के द्वार पर खुशियों का मेला आ चुका था,
और स्वागत में वहीं दहलीज पर थमने लगा तन।
देवकी नन्दन मिश्र 'देव्यन'