दीपक जलता है!

मन की देहरी पर प्रियतम , दीपक जलता है

आस जिसे है तुम आओगे
आओगे जलता पाओगे
आलोकित करता जो अंतस
उसको कितना तड़पाओगे
राग ,द्वेष से परे धरा , हर तम को हरता है


किस मिट्टी का बना हुआ है
आठों प्रहर जला करता है
और अंधेरा खड़ा द्वार पर
अपने हाथ मला करता है
अंधियारे से द्वंद युद्ध मे,हर क्षण लड़ता है
देवकी नन्दन मिश्र 'देव्यन'