अब मोहब्बत के तराने गा रहे हैं

पीर के दृष्टांत से उबरे हुए हम
अब मुहब्बत के तराने गा रहे हैं

हम घड़ी की सूइयों से घूमते हैं
अथ जहाँ था इति हमारी तो वही है
हम चले हैं एक बस्ती फिर बसाने
प्रलय सहकर,गति हमारी तो वही है

जो कथानक दृष्टियों को बेधते थे
वे सहज ही फिर नयन तक आ रहे हैं

हम नियति की चाल से अनभिज्ञ होकर
स्वप्न के कुछ खग उड़ाने लग गए हैं
और इससे ही सहमकर,भीरू होकर
पाँव उसके लड़खड़ाने लग गए हैं

खग के जो आकाश छूने के जतन में
बादलों को भी छकाते जा रहें हैं
देवकी नन्दन मिश्र 'देव्यन'