प्रेम का स्यन्दन

इस निठुर संसार के उस पार जाना चाहता है
प्रेम का स्यंदन तुम्हारे द्वार आना चाहता है,

गीत का ये स्वर अभागा,जाने कितनी रात जागा,
भावना के सीप -मोती ,कल्पना का एक धागा
प्यार के पारस ने छूकर कर दिया है स्वर्ण जीवन,
और यह गीतों की दुनिया बन गयी उस पर सुहागा

तो तुम्हे गीतों में गाकर,बादलों के पार जाकर,
आसमाँ से चाँद तारे तोड़ लाना चाहता है,

स्वप्न के महंगे खिलौने,नींद के जैसे बिछौने,
दे रहे हैं दाम जिनका,सुध भुलाकर औने-पौने,
प्यार के अंतिम चरण में,विश्व के इस आवरण में
इक तुम्हारी हां हिमालय,शेष सब उपहार बौने

जो मिले सहमति तुम्हारी,पा प्रणय की पुण्य पारी,
नींद में है ग्राम्य स्वर,उसको जगाना चाहता है
देवकी नन्दन मिश्र 'देव्यन'

प्रेम का स्यन्दन | We The Sukhanwar