रचा जा रहा महाव्यूह फिर
निर्मम नरसंहार हेतु ही
गोले बरसाने की धुन में
तोपें सीना तान खड़ीं हैं
इधर-उधर दोनों पक्षों में
जटिल-कुटिल मुस्कान खडीं हैं
पृथक कर रहा सभी किनारे
उनका योजक नियत सेतु ही
विकट शकुनियों की आमद ने
बढ़ा दिया उन्माद युद्ध का
अर्थ करें वें अर्जित जिससे
बांट रहे हैं स्वाद युद्ध का
चंद्र-सूर्य को ग्रहण लगाते
ये नर रूपी राहु-केतु ही
देवकी नन्दन मिश्र 'देव्यन'