Shivendra Mishra

मुझे ग़ज़लें मेरे मन की सनम अब गुनगुनाने दो
अजी छोड़ो भी' ये नख़रे , मोहब्बत को बढ़ाने दो।

मुहल्ले की ख़बरची चाचियों! इतना भी क्या पहरा?
किचन पर ध्यान दो अपना, छतों को मुस्कुराने दो।

इसी एक सीख से आख़िर है बढ़ता मनचलों का मन,
"तु बिटिया! ध्यान मत देना, सताता है, सताने दो।"

कभी बाँधे के बनिये से, नहीं बाजार लग पाता
उसे जबरन न रोको तुम, अगर जाता है, जाने दो।

मेरे अश'आर पर रहमो करम करके मियां बोले
अभी लड़का नया है, जो सुनाता है, सुनाने दो।

अपाहिज ही न कर डाले जरूरत से अधिक संबल
उसे पैरों पे चलने दो, परों को आज़माने दो।
Shivendra Mishra