Nazeer Nazar

इश्क़ के मक़तल में हूँ तो क्या हो हैरानी मुझे
इक न इक दिन महंगी तो पड़नी थी नादानी मुझे

अश्क़ मेरे हो न जाएं उनके भी ग़म का सबब
करनी पड़ जाती है अक्सर इनकी निगरानी मुझे

लग रहा है इश्क़ आ पहुंचा है दरवाज़े तलक
खुशबुएं आने लगी हैं जानी पहचानी मुझे

ये हमारे ख़ून के रिश्ते का शायद है कमाल
अपना सा लगने लगा है दुश्मने-जानी मुझे

मैंने उस दरया की किस्मत में समंदर लिख दिया
मिल नहीं पाया जहां दो बूंद भी पानी मुझे

मिसर-ए-ऊला में ही जब सारी गिरहें खुल गयीं
बेबसी से तक रहा है मिसर ए सानी मुझे

महफ़िले-जानां में बैठे हैं सभी इज़्ज़त मआब
उनकी नज़रें ढूंढती हैं इक गुहर या'नी मुझे

आप ही के नूर से रौशन है मेरी ज़हनियत
जाने क्यूं सब लोग समझे हैं बड़ा ज्ञानी मुझे
Nazeer Nazar