बे-वफ़ा वो अगर नही होता
दर्द-ए-दिल उम्र-भर नहीं होता
इक दफ़ा दिल से जो उतर जाए
वो कभी मोअतबर नहीं होता
उनके कूचे को कब का छोड़ आए
अब उधर से गुज़र नहीं होता
गामजन हम हैं राह-ए-उल्फत पर
पर सफ़र मुख्तसर नहीं होता
गर हलाल–ओ–हराम यकजा हों
फिर दुआ में असर नहीं होता
रोज़ इंसाफ़ क़त्ल होता था
क्यूँ ये वीराँ शहर नहीं होता
बोलते जो सदा हैं सच रहबर
उनको दुनिया का डर नहीं होता
Ejaz Rahbar