आबो - हवा बदल गई, मौसम बदल गए
मुफ़लिस की रोटी दाल से धनवान पल गए
मय की ख़ता न जानिए,नज़रों का था क़ुसूर
बस इक निगाहे-नाज़ थी जो हम फिसल गए
क्या आपकी निगाह में आब-ए- हयात था
जिसको पिलाया आपने वो सब मचल गए
अब ज़िन्दगी की राह में तन्हा बचे हैं हम
था जिसका इन्तिज़ार वो कब के निकल गए
पत्थर का दिल है आपका सब झूठ कह रहे
मेरी मुहब्बतों से तो पत्थर पिघल गए
अजय 'अद्वैत'