अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपनी ख़ुशी से बिछड़े
इश्क़ के खेल में गर कोई किसी से बिछड़े
फिर किसी दर पे ठहरने का इरादा न किया
जब तिरे दर से उठे तेरी गली से बिछड़े
उम्र-भर साथ निभाने का था वादा जिससे
अपनी क़िस्मत कि हम इक रोज़ उसी से बिछड़े
तेरे होने से बँधे रहते थे सब से रिश्ते
तुझसे बिछड़े तो ज़माने में सभी से बिछड़े
बेवफ़ाई का हम इल्ज़ाम उसे क्योंकर दें
दिल को मालूम है जब अपनी कमी से बिछड़े
हिज्र की धूप किसी पर न पड़े मेरे बाद
राह-ए-उल्फ़त में कोई अब न किसी से बिछड़े
Sabir Usmani