Sabir Usmani

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपनी ख़ुशी से बिछड़े
इश्क़ के खेल में गर कोई किसी से बिछड़े

फिर किसी दर पे ठहरने का इरादा न किया
जब तिरे दर से उठे तेरी गली से बिछड़े

उम्र-भर साथ निभाने का था वादा जिससे
अपनी क़िस्मत कि हम इक रोज़ उसी से बिछड़े

तेरे होने से बँधे रहते थे सब से रिश्ते
तुझसे बिछड़े तो ज़माने में सभी से बिछड़े

बेवफ़ाई का हम इल्ज़ाम उसे क्योंकर दें
दिल को मालूम है जब अपनी कमी से बिछड़े

हिज्र की धूप किसी पर न पड़े मेरे बाद
राह-ए-उल्फ़त में कोई अब न किसी से बिछड़े
Sabir Usmani

Sabir Usmani | We The Sukhanwar