हर सम्त ज़िंदगी ने किया है हताश और
जाकर कहाँ सुकून करूँ मैं तलाश और
जैसे ही सूखते हैं पुराने ज़रा-से ज़ख़्म
इक दिल पे उभर आती है ताज़ा ख़राश और
पूरे नहीं हुए हैं कई काम अब तलक
कुछ दिन की ज़िन्दगानी मिली होती काश और
इक तो ज़माना दूसरा अपनों के ताने रोज़
करने लगे ज़िगर को मेरे पाश-पाश और
"संगीत" जब लगा कि चमक हो रही है कम
देती हैं ठोकरें मुझे थोड़ा तराश और
Sangeet pandey