तुम्हारे हाथ से जब भी असासा छूट जाता है
वो शीशा हो या पत्थर हो या दिल हो टूट जाता है
जो कहते हैं "महज दिल ही लुटा है" कौन समझाए
लुटेरा जब भी आता है तो सब कुछ लूट जाता है
मुहब्बत देखती कब है अमीरी या ग़रीबी को
जहाँ जो छूट जाता है वहाँ वो छूट जाता है
मेरे मुँह में ज़हर है या कि अमृत है ख़ुदा जाने
न बाहर थूक जाता है न अंदर घूट जाता है
करो कुछ ऐसी तैयारी की पत्थर टूट जाएँ अब
हमेशा जंग में शीशा ही क्यूँकर टूट जाता है
Mukesh Chanchal