बिछड़के ये न समझना कि सिर्फ़ रोता हूँ
मैं आँसुओं से मुहब्बत के दाग़ धोता हूँ
वो लाश सुब्ह को साहिल पे तैर आती है
जिसे मैं रात के दरिया में ख़ुद डुबोता हूँ
मुआफ़ करके बचाता हूँ दोस्ती का शजर
अज़ीयतों के नये बीज दिल में बोता हूँ
ग़रीब लोगों से दौलत कहाँ सँभलती है
ख़ुशी ज़ियादा हो तो बेहिसाब रोता हूँ
वहाँ से सिर्फ़ मुझे तुम निकाल सकते हो
कभी-कभी तो मैं ऐसी जगह पे होता हूँ
Amulya Mishra