कोई भी आह न दबती थी मुस्कुराने में
मुझे भी थी ये सहूलत किसी ज़माने में
फ़क़त तुम्हारे तग़ाफ़ुल से बुझ गया वो चराग़
लगी थी आँधियाँ मिलकर जिसे बुझाने में
अब उस जगह पे भी कुछ लोग आके रहने लगे
जो मैंने छोड़ दी थी रास्ता बनाने में
किसी के हाथ गमे दिल के नक़्श लग गयें हैं
तुम्हारा हिस्सा भी शामिल है इस ख़ज़ाने में
सुख़नवरों को रियायत हो नौकरी में कुछ
मरे मिलेंगे वगरना ये कारख़ाने में
Amulya Mishra