Sangeet pandey

ये कैसी कश्मकश है कुछ भी न अपने बस में
इक फ़िक्र दौड़ती है केवल नफ़स-नफ़स में

परवरदिगार चाहे जैसे इसे चलाए
ये ज़िन्दगी नहीं है इंसाँ की दस्तरस में

बढ़ती ही जा रही है अब ना-मुराद ख़्वाहिश
सब-कुछ तबाह होगा इक दिन इसी हवस में

कुछ ज़िद-जुनून वाले ऐसे भी बाग़बाँ हैं
करते हैं गुल की खेती रहकर जो ख़ार-ओ-ख़स में

आज़ाद होना चाहे "संगीत" जाने कब से
जाँ छटपटा रही है इस जिस्म के क़फ़स में
Sangeet pandey