ये दिल धड़क रहा है मेरा ऐतिबार कर
मुर्दों में मत अभी से मुझे तू शुमार कर
जल्दी से कब किसी को भी हासिल हुआ हूँ मैं
ऐ मौत थोड़ा और मेरा इंतिज़ार कर
खोने को कुछ बचा ही कहाँ बाद इश्क़ के
सब कुछ तो इस जुए में मैं बैठा हूँ हारकर
तन्हाइयाँ सताती हैं रह-रहके रात-दिन
बिच्छू के जैसे डंक मुझे मार-मारकर
मज़बूरी ऐसी क्या थी मेरे यार जो तूने
शर्म-ओ-हया के रख दिए ज़ेवर उतारकर
कुछ ख़ास फ़र्क पड़ना नहीं है मुझे यकीं
अज़्मत तू चाहे जितनी मेरी दाग़दार कर
"संगीत" जिसको रास्ता मैंने दिखाया था
आगे निकल गया वो मुझे दर-किनार कर
Sangeet pandey