Sandeep Shrivastava

है बहुत मुश्किल कि सुलझें ज़िंदगी की गुत्थियाँ
माज़रत ए ज़िंदगी तेरी उड़ा दीं धज्जियाँ

बुझती आँखें पूछती थीं हमसे बस इक ही सवाल
क्या उठा लोगे अकेले आफ़तों की गठरियाँ

फ़ोन पर मैसेज करके प्यार करने वाली नस्ल
क्या कभी महसूस कर पाएगी, क्या थीं चिठ्ठियाँ

मैं भी हँस देता हूँ तेरे ज़िक्र पर और क्या करूं
जब तुम्हारे नाम से लेता है कोई चुटकियाँ

तुझपे लानत उसके दरवाज़े पे दस्तक दे अगर
तुझको आता देख जिसने बंद कर लीं खिड़कियाँ

उसकी ख़्वाहिश है हमें रोता हुआ देखे कभी
उसको कहना बांझ कर डाली हैं तूने सीपियाँ

जिस्म का अब साँस से कुछ राब्ता बाक़ी नहीं
आती जाती हैं बदन में अब तो केवल सिसकियाँ

उसकी क्या बनती नहीं है अब नए मेहबूब से
मुझको क्यूँ आने लगीं हैं रोज़ शब में हिचकियाँ

दस जगह मुँह मारना मर्दों का तो हक़ है मगर
औरतें ऐसा करें तो उनको कहिए रंडियाँ

आज दिनभर क्या किया पूछा तो मन कहने लगा
कल की ख़्वाहिश में उड़ा दीं आज की फिर धज्जियाँ
Sandeep Shrivastava

Sandeep Shrivastava | We The Sukhanwar